एक अनेक बिआपक पूरक – अभंग क्रमांक – १२
एक अनेक बिआपक पूरक, जत देखऊ तत सोई ।माइआ चित्र विचित्र बिमोहित, बिरला बूझै कोई ॥ १ ॥सभु गोबिंदु है सभु गोबिंदु है, गोबिंदु बिनु नही कोई ।सूतु एकु मणि सत सहंस जैसे, ओति पोति प्रभु सोई ॥ धृ ॥जल तरंग अरु फेन बुदबुदा, जलते भिन्न न कोई ।इह परपंचु पारब्रह्म की लीला, बिचरत आन […]
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